पृथ्वी पर चन्द्रशेखर आजाद जैसे योद्धा का अवतरण एक चमत्कारिक सत्य है, जिससे बदरिकाश्रम के समान पवित्र उन्नाव जिले का बदरका गांव संसार में जाना जाता है. कानपुर जिसे हम क्रांति-राजधानी कह सकते है, के निकटवर्ती इसी जनपद में पं. सीताराम तिवारी के पुत्र के रूप में जन्मलब्ध चन्द्रशेखर का बाल्यकाल मालवा प्रदेश में व्यतीत हुआ.
असहयोग आंदोलन से जागे देश में दमन-चक्र जारी था, सत्याग्रहियों के बीच निकल पड़े, प्रस्तरखंड उठाया, बेंत बरसाने वालों में से एक सिपाही के सिर में दे मारा. पेशी होने पर अपना नाम आजाद, काम आजादी के कारखाने में मजदूरी और निवास जेलखाने में बताया. गुस्साए अंग्रेज मजिस्ट्रेट ने पंद्रह बेंतों की सख्त सजा सुनाई. हर सांस में वंदेमातरम का निनाद करते हुए उन्होंने यह परीक्षा भी उत्तीर्ण की.
क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद अचूक निशानेबाज आजाद ने अपना पावन शरीर मातृभूमि के शत्रुओं को फिर कभी छूने नहीं दिया. क्रांति की जितनी योजनाएं बनीं सभी के सूत्रधार आजाद थे. कानपुर में भगत सिंह से भेंट हुई. साथियों के अनुरोध पर आजाद एक रात घर गए और सुषुप्त मां एवं जागते पिता को प्रणाम कर कर्तव्यपथ पर वापस आ गए. सांडर्स का वध-विधान पूरा कर राजगुरु, भगतसिंह और आजाद फरार हो गए. 8 अप्रैल 1929 को श्रमिक विरोधी ट्रेड डिस्प्यूट बिल का परिणाम सभापति द्वारा खोलते ही, इसके लिए नियुक्त दर्शक-दीर्घा में खड़े दत्त और भगत सिंह को असेंबली में बम के धमाके के साथ इंकलाब जिंदाबाद का नारा बुलंद करते गिरफ्तार कर लिया गया. भगत सिंह को छुड़ाने की योजना चन्द्रशेखर ने बनाई, पर बम जांचते वोहरा सहसा शहीद हो गए. घर में रखा बम दूसरे दिन फट जाने से योजना विफल हो गई. हमारी आजादी की नींव में उन सूरमाओं का इतिहास अमर है जिन्होंने हमें स्वाभिमानपूर्वक अपने इतिहास और संस्कृति की संरक्षा की अविचल प्रेरणा प्रदान की है.
फिर आया वह दिन
27 फ़रवरी, 1931 के दिन चन्द्रशेखर आज़ाद अपने साथी सुखदेव राज के साथ बैठकर विचार–विमर्श कर रहे थे कि तभी वहां अंग्रेजों ने उन्हें घेर लिया. चन्द्रशेखर आजाद ने सुखदेव को तो भगा दिया पर खुद अंग्रेजों का अकेले ही सामना करते रहे. अंत में जब अंग्रेजों की एक गोली उनकी जांघ में लगी तो अपनी बंदूक में बची एक गोली को उन्होंने खुद ही मार ली और अंग्रेजों के हाथों मरने की बजाय खुद ही आत्महत्या कर ली. कहते हैं मौत के बाद अंग्रेजी अफसर और पुलिसवाले चन्द्रशेखर आजाद की लाश के पास जाने से भी डर रहे थे.
चंद्रशेखर आज़ाद को वेष बदलने में बहुत माहिर माना जाता था. वह रुसी क्रांतिकारियों की कहानी से बहुत प्रेरित थे. चन्द्रशेखर आजाद की वीरता की कहानियां कई हैं जो आज भी युवाओं में देशप्रेम की लहर पैदा कर देती हैं. देश को अपने इस सच्चे वीर स्वतंत्रता सेनानी पर हमेशा गर्व रहेगा.
पृथ्वी पर चन्द्रशेखर आजाद जैसे योद्धा का अवतरण एक चमत्कारिक सत्य है, जिससे बदरिकाश्रम के समान पवित्र उन्नाव जिले का बदरका गांव संसार में जाना जाता है. कानपुर जिसे हम क्रांति-राजधानी कह सकते है, के निकटवर्ती इसी जनपद में पं. सीताराम तिवारी के पुत्र के रूप में जन्मलब्ध चन्द्रशेखर का बाल्यकाल मालवा प्रदेश में व्यतीत हुआ.
ReplyDeleteअसहयोग आंदोलन से जागे देश में दमन-चक्र जारी था, सत्याग्रहियों के बीच निकल पड़े, प्रस्तरखंड उठाया, बेंत बरसाने वालों में से एक सिपाही के सिर में दे मारा. पेशी होने पर अपना नाम आजाद, काम आजादी के कारखाने में मजदूरी और निवास जेलखाने में बताया. गुस्साए अंग्रेज मजिस्ट्रेट ने पंद्रह बेंतों की सख्त सजा सुनाई. हर सांस में वंदेमातरम का निनाद करते हुए उन्होंने यह परीक्षा भी उत्तीर्ण की.
क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद
अचूक निशानेबाज आजाद ने अपना पावन शरीर मातृभूमि के शत्रुओं को फिर कभी छूने नहीं दिया. क्रांति की जितनी योजनाएं बनीं सभी के सूत्रधार आजाद थे. कानपुर में भगत सिंह से भेंट हुई. साथियों के अनुरोध पर आजाद एक रात घर गए और सुषुप्त मां एवं जागते पिता को प्रणाम कर कर्तव्यपथ पर वापस आ गए. सांडर्स का वध-विधान पूरा कर राजगुरु, भगतसिंह और आजाद फरार हो गए. 8 अप्रैल 1929 को श्रमिक विरोधी ट्रेड डिस्प्यूट बिल का परिणाम सभापति द्वारा खोलते ही, इसके लिए नियुक्त दर्शक-दीर्घा में खड़े दत्त और भगत सिंह को असेंबली में बम के धमाके के साथ इंकलाब जिंदाबाद का नारा बुलंद करते गिरफ्तार कर लिया गया. भगत सिंह को छुड़ाने की योजना चन्द्रशेखर ने बनाई, पर बम जांचते वोहरा सहसा शहीद हो गए. घर में रखा बम दूसरे दिन फट जाने से योजना विफल हो गई. हमारी आजादी की नींव में उन सूरमाओं का इतिहास अमर है जिन्होंने हमें स्वाभिमानपूर्वक अपने इतिहास और संस्कृति की संरक्षा की अविचल प्रेरणा प्रदान की है.
फिर आया वह दिन
27 फ़रवरी, 1931 के दिन चन्द्रशेखर आज़ाद अपने साथी सुखदेव राज के साथ बैठकर विचार–विमर्श कर रहे थे कि तभी वहां अंग्रेजों ने उन्हें घेर लिया. चन्द्रशेखर आजाद ने सुखदेव को तो भगा दिया पर खुद अंग्रेजों का अकेले ही सामना करते रहे. अंत में जब अंग्रेजों की एक गोली उनकी जांघ में लगी तो अपनी बंदूक में बची एक गोली को उन्होंने खुद ही मार ली और अंग्रेजों के हाथों मरने की बजाय खुद ही आत्महत्या कर ली. कहते हैं मौत के बाद अंग्रेजी अफसर और पुलिसवाले चन्द्रशेखर आजाद की लाश के पास जाने से भी डर रहे थे.
चंद्रशेखर आज़ाद को वेष बदलने में बहुत माहिर माना जाता था. वह रुसी क्रांतिकारियों की कहानी से बहुत प्रेरित थे. चन्द्रशेखर आजाद की वीरता की कहानियां कई हैं जो आज भी युवाओं में देशप्रेम की लहर पैदा कर देती हैं. देश को अपने इस सच्चे वीर स्वतंत्रता सेनानी पर हमेशा गर्व रहेगा.